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लेखसंग्रह

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  • मनाचे श्लोक – १३१ ते १४०

    भजाया जनी पाहता राम येकु | करी बाण येकु मुखी शब्द येकु |
    क्रिया पाहता उेरे सर्व लोकू | धरा जानकीनायकाचा विवेकु ||131||

    विचारूनि बोले विवंचूनि चाले | तयाचेनि संतत्प तेही निवाले |
    बरे शोधिल्याविण बोलो नको हो | जनी चालणे शुे नेमस्त राहो ||132||

    हरीभक्त वीरक्त विज्ञानरासी | जेणे मानसीं स्थापिले निश्चयासीं |
    तया दर्शनें स्पर्शनें पुण्य जोडे | तया भाषणें नष्ट संदेह मोडे ||133||

    नसे गर्व आंगी सदा वीतरागी | क्षमा शांति भोगी दयादक्ष योगी |
    नसे लोभ ना क्षोभ ना दैन्यवाणा | इंही लक्षणी जाणिजे योगिराणा ||134||

    धरी रे मना संगती सज्जनाची | जेणे वृति हे पालटे दुर्जनाची |
    बळे भाव सद्बुेि सन्मार्ग लागे | महाक्रूर तो काळ विक्राळ भंगे ||135||

    भये व्यापिले सर्व ब्रह्मांड आहे | भयातीत ते संत आनंत पाहे |
    जया पाहता द्वैत कांही दिसेना | भय मानसी सर्वथाही असेना ||136||

    जिवा श्रेष्ठ ते स्पष्ट सांगोनि गेले | परी जीव अज्ञान तैसेचि ठेले |
    देहेबुेिचे कर्म खोटे टळेना | जुने ठेवणे मीपणे आकळेना ||137||

    भ्रमे नाडळे वित ते गुफ्त जाले | जिवा जन्मदारिद ठाकूनि आले |
    देहेबुेिचा निश्र्चयो ज्या टल्íना | ठ्ठजुने ठेवणे मीपणे आकळेना ||138||

    पुढे पाहता सर्वही केंदलेसे | अभाग्यास हे दृश्य पाषाण भासे |
    अभावे कदा पुण्य गांठी पडेना | जुने ठेवणे मीपणे आकळेना ||139||

    जयाचे तया चूकले प्राफ्त नाही | गुणे गोविले जाहले दुःख देही |
    गुणावेगळी वृति तेही वळेना | जुने ठेवणे मीपणे आकळेना ||140||

    - श्री रामदासस्वामी लिखित मनाचे श्लोक (क्रमशः)

  • मनाचे श्लोक – १४१ ते १५०

    म्हणे दास सायास त्याचे करावे | जनी जाणता पाय त्याचे धरावे |
    गुरूअंजनेवीण ते आकळेना | जुने ठेवणे मीपणे ते कळेना ||141||

    कळेना कळेना कळेना ढल्íना | ढळे नाढळे संशयोही ढल्íना |
    गळेना गळेना अहंता गळेना | बळे आकळेना मिळेना मिळेना ||142||

    अविद्यागुणे मानवा ddऊमजेना | भ्रमे चूकले हीत ते आकळेना |
    परीक्षेविणे बांधले दृढ नाणे | परी सत्य मिथ्या असे कोण जाणे ||143||

    जगीं पाहता साच ते काय आहे | अती आदरे सत्य शोधूनि पाहे |
    पुढे पाहतां पाहतां देव जोडे | भ्रम भ्रांतिं अज्ञान हे सर्व मोडे ||144||

    सदा विषयो चिंतिता जीव जाला | अहंभाव अज्ञान जन्मासी आला |
    विवेके सदा सस्वरूपी भरावे | जिवा उगमी जन्म नाही स्वभावे ||145||

    दिसे लोचनी ते नसे कल्पकोडी | अकस्मात आकारले काळ मोडी |
    पुढे सर्व जाईल कांही न राहे | मना संत आनंत शोधूनि पाहे ||146||

    फुटेना तुटेना चळेना ढळेना | सदा संचले मीपणे ते कळेना |
    तया एकरूपासि दूजे न साहे | मना संत आनंत शोधूनि पाहे ||147||

    निराकार आधार ब्रधदिकांचा | जया सांगता सीणली वेदवाचा |
    विवेके तदाकार ह्ऊोनि राहे | मना संत आनंत शोधूनि पाहे ||148||

    जगी पाहता चर्मचक्षी न लक्षे | जगी पाहता ज्ञानचक्षी न रक्षे |
    जगी पाहता पाहणे जात आहे | मना संत आनंत शोधूनि पाहे ||149||

    नसे पीत ना श्र्वेत ना शाम कांही | नसे व्यक्त अव्यक्त ना नीळ नाही |
    म्हणे दास विश्वासता मुक्ति लाहे | मना संत आनंत शोधूनि पाहे ||150||

    - श्री रामदासस्वामी लिखित मनाचे श्लोक (क्रमशः)

  • मनाचे श्लोक – १५१ ते १६०

    खरे शोधिता शोधिता शोधताहे | मना बोधिता बोधिता बोधताहे |
    परी सर्वही सज्जनाचेनि योगे | बरा निश्चयो पाविजे सानुरागे ||151||

    बहूता परी कूसरी तत्वझाडा | परी पाहिजे अंतरी तो निवाडा |
    मना सार साचार तें वेगळे रे | समस्तांमधे येक ते आगळे रे ||152||

    नव्हे पिंडज्ञाने नव्हे तत्वज्ञानें | समाधान कांही नव्हे तानमानें |
    नव्हे योगयागे नव्हे भोगत्यागें | समाधान ते सज्जनाचेनि योगें ||153||

    महावाक्य तत्वादिकें पंचकर्णें| खुणे पाविजे संतसंगें विवर्णें|
    द्वितीयासि संकेत दो दाविजेतो| तया सांडुनी चंदःमा भाविजेतो ||154||

    दिसेना जनी तेचि शोधूनि पाहे | बरे पाहता गूज तेथेचि आहे |
    करी घेउ जाता कदा आढळेना | जनी सर्व कोंदाटले तें कळेना ||155||

    म्हणे जाणता तो जनी मूर्ख पाहे | अतर्कासि तर्की असा कोण आहे |
    जनी मीपणे पाहता पाहवेना | तया लक्षिता वेगळे राहवेना ||156||

    बहू शास्त्र धुंडाळिता वाढ आहे | जया निश्र्चयो येक तोही न साहे |
    मती भांडती शास्त्रबोधे विरोधे | गती खुंटती ज्ञानबोधे प्रबोधे ||157||

    श्रुती न्याय मीमांसके तर्कशास्त्रे | स्मृती वेद वेदांतवाक्ये विचित्रे |
    स्वये शेष मौनावला स्थिर पाहे | मना सर्व जाणीव सांडून राहे ||158||

    जेणे मक्षिका भक्षिली जाणिवेची | तया भोजनाची रूची प्राफ्त कैंची |
    अहंभाव ज्या मानसींचा विरेना | तया ज्ञान हे अन्न पोटी जिरेना ||159||

    नको रे मना वाद हा खेदकारी | नको रे मना भेद नाना विकारी |
    नको रे मना शिकऊ पूढिलांसी | अहंभाव जो राहिला तूजपासी ||160||

    - श्री रामदासस्वामी लिखित मनाचे श्लोक (क्रमशः)

  • मनाचे श्लोक – १६१ ते १७०

    अहंतागुणे सर्वही दुःख होते | मुखे बोलिले ज्ञान ते व्यर्थ जाते |
    सुखी राहता सर्वही सूख आहे | अहंता तुझी तूचि शोधूनि पाहे ||161||

    अहंतागुणे नीति सांडी विवेकी | अनीतीबळे श्र्लाघ्यता सर्व लोकी |
    परी अंतरी सर्वही साक्ष येते | पःमाणांतरे बुेि सांडूनि जाते ||162||

    देहेबुेिचा निश्र्चयो दृढ झाला | देहातीत ते हीत सांडीत गेला |
    देहेबुेि ते आत्मबुेि करावी | सदा संगती सज्जनाची धरावी ||163||

    मने कल्पिला वीषयो सोडवावा | मने देव निर्गूण तो वोळखावा |
    मने कल्पिता कल्पना ते सरावी | सदा संगती सज्जनाची धरावी ||164||

    देहादीक पःपंच हा चिंतियेला | परी अंतरी लोभ निश्र्चीत ठेला |
    हरीचिंतने मुक्तिकांता वरावी | सदा संगती सज्जनाची धरावी ||165||

    अहंकार विस्तारला या देहाचा | स्त्रियापुत्रमित्रादिके मोह त्यांचा |
    बळे भ्रांति हे जन्मचिंता हरावी | सदा संगती सज्जनाची धरावी ||166||

    बरा निश्र्चयो शाश्र्वताचा करावा | म्हणे दास संदेह तो विसरावा |
    घडीने घडी सार्थकाची करावी | सदा संगती सज्ज्नाची धरावी ||167||

    करी वृत्ति जो संत तो संत तो संत जाणा | दुराशागुणे जो नव्हे दैन्यवाणा |
    उपाधी देहेबुेिते वाढवीते | परी सज्जना केवि बाधू शके ते ||168||

    नसे अंत आनंत संता पुसावा | अहंकार विस्तार हा नीरसावा |
    गुणेविण निर्गूण तो आठवावा | देहेबुेिचा आठवो नाठवावा ||169||

    देहेबुेि हे ज्ञानबोधे त्यजावी | विवेके तये वस्तुची भेट घ्यावी |
    तदाकार हे वृत्ति नाही स्वभावें | म्हणोनी सदा तेचि शोधीत जावे ||170||

    - श्री रामदासस्वामी लिखित मनाचे श्लोक (क्रमशः)

  • मनाचे श्लोक – १७१ ते १८०

    असे सार साचार ते चोरलेसे | इही लोचनी पाहता दृश्य भासे |
    निराभास निर्गूण ते आकळेना | अहंतागुणे कल्पिताही कळेना ||171||

    स्फुरे विषयी कल्पना ते अविद्या | स्फुरे ब्रध् रे जाण माया सुविद्या |
    मुळी कल्पना दो रूपे तेचि जाली | विवेके तरी सस्वरूपी मिळाली ||172||

    स्वरूपी उदेला अहंकार राहो | तेणे सर्व आच्छादिले व्योम पाहो |
    दिशा पाहता ते निशा वाढताहे | विवेके विचारे विवंचूनि पाहे ||173||

    जया चक्षुने लक्षिता लक्षवेना | भवा भक्षिता रक्षिता रक्षवेना |
    क्षयातीत तो अक्षयी मोक्ष देतो | दयादक्ष तो सक्षिने पक्ष घेतो ||174||

    विधी निर्मिता लीहितो सर्व भाळी | परी लीहिता कोण त्याचे कपाळी |
    हरू जाळितो लोक संहारकाळी | परी शेवटी शंकरा कोण जाळी ||175||

    जगी द्वादशादित्य ते रूद अकःा| असंख्यात संख्या करी कोण शकःा |
    जगी देव धुंडाळिता आढळेना | जनी मख्य तो कोण कैसा कळेना ||176||

    तुटेना फुटेना कदा देवराणा | चळेना ढळेना कदा दैन्यवाणा |
    कळेना कळेंना कदा लोचनासी | वसेना दिसेना तो जनी मीपणाशी ||177||

    जया मानला देव तो पूजिताहे | परा देव शोधूनि कोणी न पाहे |
    जगी पाहता देव कोटयानकोटी | जया मानली भक्ती जे तेचि मोठी ||178||

    तिन्ही लोक जेथून निर्माण जाले | तया देवरायासि कोणी न बोले |
    जगी थोरला देव तो चोरलासे | सदगुरूवीण तो सर्वथाही न दीसे ||179||

    गुरू पाहतां पाहतां लक्ष कोटी | बहूसाल मंत्रावळी शक्ति मोंठी |
    मनी कामना चेटके घातमाता | जनी व्यर्थ रे तो नव्हे मुक्तिदाता ||180||

    - श्री रामदासस्वामी लिखित मनाचे श्लोक (क्रमशः)

  • मनाचे श्लोक – १८१ ते १९०

    नव्हे चेटकी चाळकू दःव्यभोंदू | नव्हे निंदकू मत्सरू भक्तीमंदू |
    नव्हे उन्मतू वेसनी संगबाधू | जनी ज्ञानिया तोचि साधू अगाधू ||181||

    नव्हे वाउगी चाऊटी काम पोटी | किःयेवीण वाचाळता तेचि मोठी |
    मुखी बोलिल्यासारिखे चालताहे | मना सदगुरू तोचि शोधूनि पाहे ||182||

    जनी भक्त ज्ञानी विवेकी विरागी | कृपाळू मनस्वी क्षमावंत योगी |
    प्रभू दक्ष व्युत्पन्न चातुर्य जाणे | तयाचेन योगे समाधान बाणे ||183||

    नव्हे तेचि जाले नसे तेचि आले | कळो लागले सज्जनाचेनि बोले |
    अनिर्वाच्य ते वाच्य वाचे वदावे | मना संत आनंत शोधीत जावे ||184||

    लपावे अती आदरे रामरूपी | भयातीत निश्र्चीत ये सस्वरूपी |
    कदा तो जनी पाहताही दिसेना | सदा ऐक्य तो भिन्नभावे वसेना ||185||

    सदा सर्वदा राम सन्नीध आहे | मना सज्जना सत्य शोधून पाहे |
    अखंडीत भेटी रघूराजयोगू | मना सांडि रे मीपणाचा वियोगु ||186||

    भुते पिंड ब्रम्हांड हे ऐक्य आहे | परी सर्वही सस्वरूपी न साहे |
    मना भासले सर्व कांही पहावे | परी संग सोडूनि सूखी राहावे ||187||

    देहेभान हे ज्ञानशास्त्रे खुडावे | विदेहीपणे भक्तीमार्गेचि जावे |
    विरक्तीबळे निंध सर्वे त्यजावे | परी संग सोडूनि सूखे रहावे ||188||

    मही निर्मिली देव तो ओळखावा | जया पाहता मोक्ष तत्काळ जीवा |
    तया निर्गुणालागि गूणी पहावे | परी संग सोडूनि सूखे रहावे ||189||

    नव्हे कार्यकर्ता नव्हे सृष्टिभर्ता | परेहूनि पर्ता न लिंपे विवर्ता |
    तया निर्विकल्पासि कल्पीत जावे | परी संग सोडूनि सूखे राहावे ||190||

    - श्री रामदासस्वामी लिखित मनाचे श्लोक (क्रमशः)

  • मनाचे श्लोक – १९१ ते २०५

    देहेबुेिचा निश्र्चयो ज्या टळेना | तया ज्ञान कल्पांतकाळी कळेना |
    पर ब्रध् ते मीपणे आकळेना | मनी शून्य अज्ञान हे मावळेना ||191||

    मना ना कळे ना ढळे रूप ज्याचे | दुजेवीण ते ध्यान सर्वोत्तमाचे |
    तया खूण ते हीन दृष्टांत पाहे | तेथे संग निसंग दोनी न साहे ||192||

    नव्हे जाणता नेणता देवराणा | न ये वर्णिता वेदशास्त्रा पुराणा |
    नव्हे दृश्य अदृश्य साक्षी तयाचा | श्रुती नेणती नेणती अंत त्याचा ||193||

    वसे थ्दयी देव तो कोण कैसा | पुसे आदरे साधकूः प्रश्र्न ऐसा |
    देहे टाकिता देव कोठे रहातो | परी मागुता ठाव कोठे पहातो ||194||

    वसे थ्दयी देव तो जाण ऐसा | नभाचेपरी व्यापकू जाण तैसा |
    सदा संचला येत ना जात कांही | तयावीण कोठे रिता ठाव नाही ||195||

    नभी वावरे जो अणूरेणू कांही | रिता ठाव या राघवेवीण नाही |
    तया पाहता पाहता तेचि जाले | तेथे लक्ष आलक्ष सर्वै बुडाले ||196||

    नभासारिखे रूप या राघवाचे | मनी चिंतिता मूळ तूटे भवाचे |
    तया पाहता देहबुेाऩ उरेना | सदा सर्वदा आर्त पोटी पुरेना ||197||

    नभे व्यापिले सर्व सृष्टी आहे | रघूनायका ऊपमा ते न साहे |
    दुजेवीण जो तोचि तो हा स्वभावे | तया व्यापकू व्यर्थ कैसे म्हणावे ||198||

    अती जीर्ण विस्तीर्ण ते रूप आहे | तेथे तर्कसंपर्क तोही न साहे |
    अती गूढ ते दृढ तत्काळ सोपे | दुजेवीण जें खूण स्वामीप्रतापे ||199||

    कळे आकळे रूप ते ज्ञान होता | तेथे आटली सर्वसाक्षी अवस्था |
    मना उन्मनी शब्द कुंठीत राहे | तो गे तोचि तो राम सर्वत्र पाहे ||200||

    कदा ओळखीमाजि दूजे दिसेना | मनी मानसी द्वैत कांही वसेना |
    बहुता दिसा आपुली भेटि झाली | विदेहीपणे सर्व काया निवाला ||201||

    मना गूज रे तूज हे प्राफ्त जाला | परी अंतरी पाहिजे यत्न केले |
    सदा श्रवणे पाविजे निश्र्चयासी | धरी सज्जन संगती धन्य होसी ||202||

    मना सर्वही संग सोडून द्यावा | अती आदरे सज्जनाचा धरावा |
    जयाचेनि संगे महादुःख भंगे | जनी साधनेवीण सन्मार्ग लागे ||203||

    मना संग हा सर्व संगास तोडी | मना संग हा मोक्ष तत्काळ जोडी |
    मना संग हा साधका शीघ्र सोडी | मना संग हा ेमत निशेष मोडी ||204||

    मनाची शते एकता दोष जाती | मतीमंद ते साधना योग्य होती |
    चढे ज्ञान वैराग्य सामर्थ्य अंगी | म्हणे दास विश्र्वासता मुक्ति भोगी ||205||

    - श्री रामदासस्वामी लिखित मनाचे श्लोक (क्रमशः)

  • मनाचे श्लोक – १ ते १०

    गणाधीश जो ईश सर्वां गुणांचा | मुळारंभ आरंभ तो निर्गुणाचा |
    नमूशारदा मूळ चत्वार वाचा | गमू पंथ आनंत या राघवाचा ||1 | |

    मना सज्जना भक्तिपंथेचि जावे | तरी श्रीहरी पाविजेतो स्वभावे |
    जनी निंद्य ते सर्व सोडूनि द्यावे | जनी वंद्य ते सर्वभावे करावे ||2 | |

    प्रभाते मनी राम चिंतीत जावा | पुढे वैखरी राम आधी वदावा |
    सदाचार हा थोर सोडू नये तो | जनी तोचि तो मानवी धन्य होतो ||3 | |

    मना वासना दुष्ट कामा नये रे | मना सर्वथा पापबुध्दी नको रे |
    मना धर्मता नीति सोडू नको हो |मना अंतरी सार वीचार राहो ||4 | |

    मना पापसंकल्प सोडूनि द्यावा | मना सत्यसंकल्प जीवीं धरावा |
    मना कल्पना ते नको वीषयांची | विकारे घडे हो जनी सर्व ची ची ||5 | |

    नको रे मना कोध हा खेदकारी | नको रे मना काम नाना विकारी |
    नको रे मना लोभ हा अंगकारु | नको रे मना मत्सरु दंभभारु ||6 ||

    मना श्रेष्ठ धारिष्ट जीवी धरावे | मना बोलणे नीच सोशीत जावे |
    स्वये सर्वदा नम्र वाचे वदावे | मना सर्व लोकांसि रे नीववावे ||7 | |

    देहे त्यागिता कीर्ति मागे उरावी | मना सज्जना हेचिं क्रिया धरावी |
    मना चंदनाचे परी त्वां झिजावे | परी अंतरी सज्जना नीववावे ||8 | |

    नको रे मना दव्य ते पूढिलांचे | अति स्वार्थबुध्दी न रे पाप सांचे |
    घडे भोगणे पाप ते कर्म खोटे | न होता मनासारखे दुःख मोठे ||9 | |

    सदा सर्वदा प्रीति रामीं धरावी | सुखाची स्वये सांडि जीवी करावी |
    देहेदुःख हे सूख मानीत जावे | विवेकें सदा सस्वरुपीं भरावें ||10||

    - श्री रामदासस्वामी लिखित मनाचे श्लोक (क्रमशः)

  • श्री म्हाळसाकांताची आरती

    अनेक कायस्थ कुटुंबात अतिशय भक्तीभावानी गायली जाणारी हि श्री म्हाळसाकांताची आरती आपल्या सर्वांच्या माहितीसाठी .... !!!!

    पिवळे निशाण तुमचे पिवळे शिखर ..पिवळे शिखर !
    पिवळा कांचन पर्वत , पिवळा कांचन पर्वत ...पिवळे नगर
    पिवळी तुमची काया पिवळा शृंगार ....पिवळा शृंगार !
    पिवळे राजे तुम्ही ...पिवळे राजे तुम्ही राणी सुकुमार !
    जयदेव जयदेव जयशिव मैराळा जयशिव मैराळा
    विशाल शंकर ढवळा... विशाल शंकर ढवळा ,त्याहुनी तू पिवळा //१//
    पिवळी बाणा बाई धनगरीण बाळ, धनगरीण बाळ
    पिवळ्या घोड्यावरी बससी मैराळ !
    चारी वाद्ये वाजती देवांच्या सकळा देवांच्या सकळा
    दासी झाल्या मुरळ्या ..दासी झाल्या मुरळ्या
    भोगिसी त्या सकळा !
    जयदेव जयदेव जयशिव मैराळा जयशिव मैराळा ....
    विशाळ शंकर ढवळा , विशाळ शंकर ढवळा , त्याहुनी तू पिवळा //२//
    चंपाषष्ठी चा कुळधर्म केला ...कुळधर्म केला
    पिवळ्या पुरणाची ..पिवळ्या पुरणाची आरती देवाला
    रोग्याने सेवा केली त्यावरी सकळा ...त्यावरी सकळा ,
    त्यावरी कृपा केली... त्यावरी कृपा केली ...पिवळ्या मैराळा
    जयदेव जयदेव ..जयशिव मैराळा ,जयशिव मैराळा
    विशाळ शंकर ढवळा , विशाळ शंकर ढवळा ...त्याहुनी तू पिवळा //४//
    सदानंदाचा येळकोट !!!
    येळकोट येळकोट ...जय मल्हार !!!

    -- चिंतामणी कारखानीस

  • श्री रामरक्षा

    पूर्वी प्रत्येक घरातून श्री रामरक्षा संध्याकाळी म्हंटली जायची . कधी कधी वडीलधारी मंडळी सोप्यावर संध्याकाळी फे-या मारत आणि रामरक्षा मोठ्या आवाजात म्हणत. ती ऐकत असताना लहान मुलांची आपोआप पाठ होत असे.

    संध्याकाळी रामरक्षा स्तोत्र म्हणणे हे हिंदू घर असल्याची एक खूण होती.घराचा सुसंस्कृतपणा या स्तोत्रावरून ओळखला जायचा.संध्याकाळी तुळशी वृंदावना जवळ दिवा लावणे.घरात देवाजवळ दिवा लावणे . शुभंकरोती कल्याणं ....म्हणणे आणि त्या नंतर रामरक्षा हे नित्योपचार असायचे .

    रामरक्षा अत्यंत गुणकारी असून घरात सौख्य , आरोग्य , आणि ऐश्वर्य प्रदान करणारे स्तोत्र आहे. मार्कंडेय ऋषींनी रचलेल्या महामृत्युंजय मंत्रा मध्ये जी ताकद आहे तेव्हडीच ताकद या स्तोत्रात आहे.ज्या घरात हे स्तोत्र लहान मुलांना शिकवले जाते त्या घरात सदैव नितीमत्ता आणि त्यातून येणारे धैर्य घरातील लोकांमध्ये वास करून असते .हल्ली मुले रामरक्षा म्हणत नाहीत . ती पुन्हा परत म्हणणे सुरु करणे हि काळाची गरज आहे.सोबत एक यु ट्यूब ची लिंक दिलेली आहे. रामरक्षा कशी म्हणावी हे ती लिंक उघडल्यावर कळेल !!!

    श्री राम ....

    https://www.youtube.com/watch?v=TIbijIE0Om4

    --चिंतामणी कारखानीस