महाकवी कालिदास रचित ” रघु वंश “
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कविता-गझल-चारोळी-वात्रटिकाअन्तः पुरीचे जन तै नृपापरी /
कुमार जन्मास अधी निरोपिती /
श्रवोनिया अमृत तुल्य आकक्षरे /
सर्व स्वेद वर्जुनी छत्र चामरे // १६ //
निर्वातशा स्थानिय पंक जापारी /
तटस्थ नेत्रे सुत पाहिल्यावरी /
नृपास प्रेम न समाय अंतरी /
विधू पाहता बहु पूर सागरी // १७ //