शिकवा कैसा इंसान था, बदल गया,
वक़्त के हर इम्तिहान में ढल गया।
जो सच्चाई की राह पर चलता रहा,
भीड़ की चाह में वो भी चल गया।
जिसके लफ़्ज़ों में होती थी रोशनी,
आज ख़ामोशी का साया बन गया।
अपनों से ही मिली जब ठोकरें उसे,
आईने से भी उसका चेहरा जल गया।
शिकवा नहीं अब किसी से ऐ ज़िंदगी,
जो था अपना वही सबसे ज़्यादा बदल गया।
•ॲड.कीर्तिराज शैलेंद्र आगलावे, पुणे
Author
Post Views: 20