मनाचे श्लोक – ७१ ते ८०

जयाचेनि नामे महा दोष जाती | जयाचेनि नामे गती पाविजेती |
जयाचेनि नामें घडे पुण्यठेवा | प्रभाते मनी राम चिंतीत जावा ||71||

न वेचे कदा ग्रंथिचे अर्थ कांही | मुखे नाम उच्चारिता कष्ट नाही |
महा घोर संसार शत्रु जिणावा | प्रभाते मनी राम चिंतीत जावा ||72||

देहेदंडणेचे महादुःख आहे | महादुःख ते नाम घेता न राहे |
सदाशीव चिंतीतसे देवदेवा | प्रभाते मनी राम चिंतीत जावा ||73||

बहूतांपरी संकटे साधनांची | व्रते दान उद्यापने ती धनाची |
दिनाचा दयाळू मनी आठवावा | प्रभाते मनी राम चिंतीत जावा ||74||

समस्तामध्ये सार साचार आहे | कळेना तरी सर्व शोधूनि पाहे |
जिवा संशयो वाउगा तो त्यजावा | प्रभाते मनी राम चिंतीत जावा ||75||

नव्हे कर्म ना धर्म ना योग कांही | नव्हे भोग ना त्याग ना सांग पाही |
म्हणे दास विश्वास नामीं धरावा | प्रभाते मनी राम चिंतीत जावा ||76||

करी काम निष्काम या राघवाचे | करी रुप स्वरुप सर्वा जिवाचे |
करी छंद निर्द्वंद्व हे गूण गाता | हरीकीर्तनी वृत्तिविश्वास होता ||77||

अहो ज्या नरा रामविश्वास नाही | ताया पामरा बाधिजे सर्व कांही |
महाराज तो स्वामि कैवल्यदाता | वृथा वाहणे देहसंसारचिंता ||78||

मना पावना भावना राघवाची | धरी अंतरी सोडि चिंता भवाची |
भवाची जिवा मानवा भूलि ठेली | नसे वस्तुची धारणा व्यर्थ गेली ||79||

धरा श्रीवरा त्या हरा अम्तराते | तरा दुस्तरा त्या परा सागराते |
सरा वीसरा त्या भरा दुर्भराते | करा नीकरा त्या खरा मत्सराते ||80||

- श्री रामदासस्वामी लिखित मनाचे श्लोक (क्रमशः)



जयाचेनि नामे महा दोष जाती | जयाचेनि नामे गती पाविजेती |
जयाचेनि नामें घडे पुण्यठेवा | प्रभाते मनी राम चिंतीत जावा ||71||

न वेचे कदा ग्रंथिचे अर्थ कांही | मुखे नाम उच्चारिता कष्ट नाही |
महा घोर संसार शत्रु जिणावा | प्रभाते मनी राम चिंतीत जावा ||72||

देहेदंडणेचे महादुःख आहे | महादुःख ते नाम घेता न राहे |
सदाशीव चिंतीतसे देवदेवा | प्रभाते मनी राम चिंतीत जावा ||73||

बहूतांपरी संकटे साधनांची | व्रते दान उद्यापने ती धनाची |
दिनाचा दयाळू मनी आठवावा | प्रभाते मनी राम चिंतीत जावा ||74||

समस्तामध्ये सार साचार आहे | कळेना तरी सर्व शोधूनि पाहे |
जिवा संशयो वाउगा तो त्यजावा | प्रभाते मनी राम चिंतीत जावा ||75||

नव्हे कर्म ना धर्म ना योग कांही | नव्हे भोग ना त्याग ना सांग पाही |
म्हणे दास विश्वास नामीं धरावा | प्रभाते मनी राम चिंतीत जावा ||76||

करी काम निष्काम या राघवाचे | करी रुप स्वरुप सर्वा जिवाचे |
करी छंद निर्द्वंद्व हे गूण गाता | हरीकीर्तनी वृत्तिविश्वास होता ||77||

अहो ज्या नरा रामविश्वास नाही | ताया पामरा बाधिजे सर्व कांही |
महाराज तो स्वामि कैवल्यदाता | वृथा वाहणे देहसंसारचिंता ||78||

मना पावना भावना राघवाची | धरी अंतरी सोडि चिंता भवाची |
भवाची जिवा मानवा भूलि ठेली | नसे वस्तुची धारणा व्यर्थ गेली ||79||

धरा श्रीवरा त्या हरा अम्तराते | तरा दुस्तरा त्या परा सागराते |
सरा वीसरा त्या भरा दुर्भराते | करा नीकरा त्या खरा मत्सराते ||80||

– श्री रामदासस्वामी लिखित मनाचे श्लोक (क्रमशः)

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