मनाचे श्लोक – ११ ते २०

जगीं सर्व सूखी असा कोण आहे | विचारी मना तूंचि शोधूनि पाहे |
मना त्वांचि रे पूर्वसंचीत केले | तयासारिखे भोगणे प्राफ्त झाले ||11||

मना मानसी दुःख आणू नको रे | मना सर्वथा शोक च़िंता नको रे |
विवेकें देहबुध्दि सोडूनि द्यावी | विदेहीपणें मुक्ति भोगीत जावी ||12||

मना सांग पां रावणा काय झाले | आकस्मात ते राज्य सर्वै बुडाले |
म्हणोनी कुडी वासना सांडि वेगीं | बळे लागला काळ हा पाठलागी ||13||

जिवा कर्मयोगें जनी जन्म झाला | परी शेवटीं काळमूखी निमाला |
महाथोर ते मृत्युपंथेचि गेले | कितीएक ते जन्मले आणि मेले ||14||

मना पाहता सत्य हे मृत्यभूमी | जितां बोलती सर्वही जीव मी मी |
चिरंजीव हे सर्वही मानिताती | आकस्मात सांडूनिया सर्व जाती ||15||

मरे ऐक त्याचा दुजा शोक वाहे | आकस्मात तोही पुढे जात आहे |
पुरेना जनी लोभ रे क्षोभ होतो | म्हणोनी जनीं मागुता जन्म घेतो ||16||

मनीं मानव व्यर्थ चिंता वहाते | आकस्मात होणार होऊन जाते |
घडे भोगणे सर्वही कर्मयोगे | मतीमंद ते खेद मानी वियोगे ||17||

मना राघवेवीण आशा नको रे | मना मानवाची नको कीर्ति तू रे |
जया वर्णिती वेद शास्त्रे पुराणे | तया वर्णिता सर्वही श्लाघ्यवाणे ||18||

मना सर्वथा सत्य सोडू नको रे | मना सर्वथा मिथ्य मांडू नको रे |
मना सत्य ते स्ा़त्य वाचे वदावे | मना मिथ्य ते मिथ्य सोडूनि द्यावे ||19||

बहू हिंपुटी होज्ञख्154लृजे मायपोटी | नको रे मना यातना तेचि मोठी |
निरोधे पचे कोंडिले गर्भवासी | अधोमूख रे दुःख त्या बाळकासी ||20||

- श्री रामदासस्वामी लिखित मनाचे श्लोक (क्रमशः)



जगीं सर्व सूखी असा कोण आहे | विचारी मना तूंचि शोधूनि पाहे |
मना त्वांचि रे पूर्वसंचीत केले | तयासारिखे भोगणे प्राफ्त झाले ||11||

मना मानसी दुःख आणू नको रे | मना सर्वथा शोक च़िंता नको रे |
विवेकें देहबुध्दि सोडूनि द्यावी | विदेहीपणें मुक्ति भोगीत जावी ||12||

मना सांग पां रावणा काय झाले | आकस्मात ते राज्य सर्वै बुडाले |
म्हणोनी कुडी वासना सांडि वेगीं | बळे लागला काळ हा पाठलागी ||13||

जिवा कर्मयोगें जनी जन्म झाला | परी शेवटीं काळमूखी निमाला |
महाथोर ते मृत्युपंथेचि गेले | कितीएक ते जन्मले आणि मेले ||14||

मना पाहता सत्य हे मृत्यभूमी | जितां बोलती सर्वही जीव मी मी |
चिरंजीव हे सर्वही मानिताती | आकस्मात सांडूनिया सर्व जाती ||15||

मरे ऐक त्याचा दुजा शोक वाहे | आकस्मात तोही पुढे जात आहे |
पुरेना जनी लोभ रे क्षोभ होतो | म्हणोनी जनीं मागुता जन्म घेतो ||16||

मनीं मानव व्यर्थ चिंता वहाते | आकस्मात होणार होऊन जाते |
घडे भोगणे सर्वही कर्मयोगे | मतीमंद ते खेद मानी वियोगे ||17||

मना राघवेवीण आशा नको रे | मना मानवाची नको कीर्ति तू रे |
जया वर्णिती वेद शास्त्रे पुराणे | तया वर्णिता सर्वही श्लाघ्यवाणे ||18||

मना सर्वथा सत्य सोडू नको रे | मना सर्वथा मिथ्य मांडू नको रे |
मना सत्य ते स्ा़त्य वाचे वदावे | मना मिथ्य ते मिथ्य सोडूनि द्यावे ||19||

बहू हिंपुटी होज्ञख्154लृजे मायपोटी | नको रे मना यातना तेचि मोठी |
निरोधे पचे कोंडिले गर्भवासी | अधोमूख रे दुःख त्या बाळकासी ||20||

– श्री रामदासस्वामी लिखित मनाचे श्लोक (क्रमशः)

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